श्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी के लिये पद-ओहदे मायने नहीं रखते- ✍️ jk Kushwaha CHANDAN
कल्पना करिये संघर्षो के दौर में आभावग्रस्त जिंदगी से जूझते हुए समाज की पीड़ा को महसूस कर, ऐसे समय में जब यह वर्ग विवेक शुन्यता के दलदल से निकलने की कोशिश कर रहा था, राजनैतिक और सामजिक चेतना सुसुप्त थी; उसी समय में श्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी ने इलाहाबाद से शैक्षणिक कार्य करते हुए दलित-पिछड़े वर्गों में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ, अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ करारा प्रहार कर समाज को जागरूक करने का बीड़ा उठा लिया। इन वर्गो में राजनैतिक, शैक्षिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिये जगह-जगह मनुवादी ताकतों से लड़ना शुरू कर दिया। वे जहाँ जाते इनकी बात रखने के पूर्व वहाँ सैकड़ो की संख्या में पुलिस-प्रशासन मौजूद रहता। शुरुआत से ही दलित-पिछड़े, शोषित-पीड़ित वर्गों की पीड़ा को महसूस करने वाले श्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी ने मजदूरों, किसानों के हितों के लिये संघर्ष किया उन्होंने दलित, बहुजन मुवमेंट से जुड़कर, मान्यवर कांशीराम जी से जुड़कर जगह-जगह अनेकानेक कार्यक्रम किये। वे लोकदल में सक्रिय रहते हुए समाज के लिये हमेशा समर्पित रहे और यही बात बहन कु. मायावती जी को पसंद आयी और उन्होंने बिना किसी प्रतिस्वर के जो भी जिम्मेदारी दिया उसका पूरा निष्ठा और ईमानदारी के साथ निर्वहन किया।
वर्ष 1980 से पूर्व से उत्तर प्रदेश की राजनीती में लगातार चार दशकों से भी अधिक समय से परिवार से समाज, सड़क से सदन का संघर्ष अपने मजबूत बहुजन विचारों के साथ अडिग रहकर किया और कभी सम्मान और स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया।
वर्ष 1996 से वर्तमान तक पक्ष और विपक्ष के केंद्र में हैं और श्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी ने हर समय गाँव-गरीब की लड़ाई लड़ा और इन वर्गो की आवाज भी अनवरत बुलंद किया जब कभी, जहाँ कहीं भी लोगों ने मिलने की कोशिश की, वे मिले और लोगों की अनवरत समस्याओ को सुनकर उसका त्वरित समाधान किया और यही श्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी की असली पहचान भी है, जो विरोधियों को कहीं टिकने नहीं देती है।
बसपा सरकार में सत्ता के केंद्र में रहे। कभी उन्होंने अपने हित की बात नहीं सोची, उन्होंने अपने बसपा कार्यकर्ताओ को बुलाबुलाकर उनके दुःख-दर्द और तकलीफे सुनी और दूर करने का हर सम्भव प्रयत्न किया लेकिन जब कार्यकर्ताओ की मेहनत और उनके त्याग के स्थान पर पार्टी ने थैलीशाहों को टिकट देना शुरू किया तो उन्होंने बिना सम्मान और स्वाभिमान के पार्टी को लात मारकर छोड़ दिया जिसके बाद धीरे-धीरे यह पार्टी सिर्फ दो लोगों की पार्टी बनकर रह गईं और आज दो विधायकों के लिये भी यह पार्टी मोहताज बन गईं है।
जब पिछड़े जाति में पैदा होने के मोदी की दुःख और तकलीफ की दुहाई सुनकर और बसपा की थैलीशाही को बंद करने के लिये, जहर पीकर बीजेपी को प्रदेश में खड़ा किया तब यही सोचा था की अपने वर्गो को हक-अधिकार दिलाऊंगा लेकिन जब वहीं बीजेपी दलित-पिछड़े वर्ग के युवाओं के 18हजार शिक्षक भर्ती में पद की घोटाला कर सामान्य वर्ग को दे दिया और इनके हक-अधिकारों की बेतहाशा लूट शुरू की तो इन्होने सत्ता को लात मारकर कैबिनेट मंत्री से इस्तीफा दे दिया।
श्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी आज सदस्य विधानपरिषद् हैं, सपा को ज्वाइन करते हुए किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया क्योंकि उनके लिये पद और ओहदे, टिकट और सत्ता मायने नहीं रखती यदि किसी चीज का मायने हैं तो सिर्फ बचपन में भेदभाव को नजदीक से महसूस करने, दलित-पिछड़े वर्गों के साथ शदियों से चली आ रहीं उपेक्षा को दूर करने और इन वर्गों को शशक्त बनाने की पीड़ा हैं और जो पीड़ा इन्होने महसूस किया हैं आज उसी बीड़ा को उठाकर अनवरत चल रहे हैं और अपने 85% वर्गों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
jk Kushwaha CHANDAN की कलम से...

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